लद्दाख हिंसा पर फ़ारूक़ अब्दुल्ला की चेतावनी, बोले- “केंद्र सबक़ ले”

leh ladakh protest | जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फ़ारूक़ अब्दुल्ला (Farooq Abdullah) ने लद्दाख में हाल ही में भड़की हिंसा को लेकर केंद्र सरकार को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि केंद्र को इस घटना से सबक़ लेना चाहिए, क्योंकि यह बाहरी ताक़तों की नहीं बल्कि स्थानीय जनता की आवाज़ है। फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने चेतावनी दी कि सीमावर्ती क्षेत्रों में इस तरह की अशांति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा बन सकती है, ख़ासकर तब जब चीन बार-बार भारत को अस्थिर करने की कोशिश करता रहा है।

14 दिन की भूख हड़ताल और नंगे पांव यात्रा से हिंसा तक

लद्दाख में उग्र प्रदर्शन का सीधा संबंध पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आंदोलन से जोड़ा जा रहा है। वांगचुक पिछले पाँच वर्षों से शांतिपूर्ण तरीक़े से राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल किए जाने की माँग उठा रहे हैं। उन्होंने हाल ही में 14 दिन की भूख हड़ताल की थी और इससे पहले लेह से दिल्ली तक नंगे पांव यात्रा भी की थी।

फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा—

“कारण यह था कि वह (सोनम वांगचुक) 14 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे रहे। पाँच साल से चुपचाप यह कह रहे थे कि हमें छठी अनुसूची में शामिल करो और राज्य का दर्जा दो। उन्होंने तो नंगे पांव चलकर लेह से दिल्ली तक का सफ़र भी किया, लेकिन उनकी आवाज़ नहीं सुनी गई। युवाओं को लगा कि पाँच साल पहले किए गए वादे खोखले थे। नतीजतन, वे अपना ग़ुस्सा काबू में नहीं रख पाए और हिंसा का रास्ता चुन लिया।”

leh ladakh protest में चार की मौत, 80 से अधिक घायल

लेह में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हिंसक रूप ले गईं। प्रदर्शनकारियों ने बीजेपी दफ़्तर, पुलिस वाहनों और कई इमारतों को आग के हवाले कर दिया। पुलिस ने जवाबी कार्रवाई में आंसू गैस और यहाँ तक कि गोलियों का इस्तेमाल किया।

फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने कहा—

“जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है, चार लोग मारे गए हैं और कई गंभीर हालत में हैं। 60-80 लोग घायल हैं और अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं। यह घटना सीमा से लगे राज्य में हुई है, जो बेहद ख़तरनाक है। इसे जल्द से जल्द हल किया जाना चाहिए, वरना एक और चिंगारी हालात को और बिगाड़ सकती है।”

“जम्मू-कश्मीर को भी दिए थे ऐसे ही वादे”

फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने लद्दाख की स्थिति का हवाला देते हुए जम्मू-कश्मीर को लेकर केंद्र पर वादा खिलाफी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा—

“केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से भी वादा किया था कि परिसीमन और चुनावों के बाद राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा। लेकिन वादे अब तक अधूरे हैं। सरकार को लद्दाख से सबक़ लेना चाहिए।”

लेह में धारा 163 के तहत पाबंदी

लद्दाख में हिंसा के बाद ज़िला प्रशासन ने कड़े सुरक्षा क़दम उठाए हैं। लेह में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) की धारा 163 लागू कर दी गई है। इस आदेश के तहत पाँच या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने, जुलूस या रैली निकालने पर रोक लगा दी गई है। किसी भी तरह का आयोजन करने के लिए प्रशासन की पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक होगी।

एलजी की हाई-लेवल सुरक्षा बैठक

लद्दाख के उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता ने गुरुवार को उच्च स्तरीय सुरक्षा समीक्षा बैठक की। इसमें हालात पर नज़र रखने, एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सक्रिय क़दम उठाने पर ज़ोर दिया गया।

“हमारी पाँच साल की लड़ाई शांतिपूर्ण रही है”

लेह एपेक्स बॉडी और करगिल डेमोक्रेटिक एलायंस के क़ानूनी सलाहकार हाजी ग़ुलाम मुस्तफ़ा ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा—

“हमने पिछले पाँच वर्षों से अपनी माँगों को शांतिपूर्ण ढंग से रखा है। सरकार भी बातचीत में सहयोग करती रही है। इस बीच हुई हिंसा दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे आंदोलन की दिशा बदल सकती है।”

गृह मंत्रालय का पक्ष

गृह मंत्रालय ने जानकारी दी कि सोनम वांगचुक ने 10 सितंबर को भूख हड़ताल शुरू की थी। मंत्रालय ने यह भी बताया कि सरकार पहले से ही एपेक्स बॉडी लेह और करगिल डेमोक्रेटिक एलायंस के साथ औपचारिक और अनौपचारिक वार्ताओं में शामिल रही है।

सरकार की ओर से हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) और उप-समिति के माध्यम से कई दौर की बातचीत की गई है। इसके परिणामस्वरूप कुछ अहम फैसले लिए गए, जैसे—

  • लद्दाख की अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण 45% से बढ़ाकर 84% करना,
  • स्थानीय परिषदों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना,
  • भोटी और पुर्गी भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा देना,
  • 1,800 पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू करना।
  • मंत्रालय ने आरोप लगाया कि कुछ “राजनीतिक रूप से प्रेरित तत्व” अब तक हुई प्रगति को बाधित करने की कोशिश कर रहे हैं।

आगामी बैठकें और आंदोलन का भविष्य

हाई-पावर्ड कमेटी की अगली बैठक 6 अक्टूबर को प्रस्तावित है। इसके अलावा 25 और 26 सितंबर को भी लेह और करगिल के नेताओं से बातचीत तय है। हालाँकि, हाल की हिंसा और जन असंतोष ने इन बैठकों के माहौल पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

छठी अनुसूची की माँग क्यों?

लद्दाख की जनता लंबे समय से चाहती है कि उनके क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए। इस अनुसूची में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान हैं। इसमें जनजातीय स्वायत्त परिषदों को प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार दिए जाते हैं। लद्दाख के नेताओं का मानना है कि इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान और संसाधनों की रक्षा बेहतर तरीक़े से हो सकेगी।

लद्दाख में भड़की हिंसा ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि विकास और सुरक्षा से जुड़ी किसी भी नीति का वास्तविक समाधान तभी संभव है, जब स्थानीय जनता को विश्वास में लिया जाए। फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने केंद्र को आगाह किया है कि इस मामले को गंभीरता से लेकर जल्द से जल्द समाधान निकाला जाए। अन्यथा, सीमावर्ती इलाक़े में अशांति का लाभ बाहरी ताक़तें उठाने से नहीं चूकेंगी।

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