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VIP सफारी! MP के DM ने टाइगर रिजर्व को बनाया निजी जागीर?

मध्य प्रदेश के संजय टाइगर रिजर्व के जंगलों में एक सफारी वाहन, जिस पर अवैध प्रवेश के आरोप लगे हैं। टाइगर रिजर्व के संरक्षित क्षेत्र में नियमों के उल्लंघन की जांच जारी।

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MP Tiger Reserve Controversy | मध्य प्रदेश का ‘संजय टाइगर रिजर्व’—जहां बाघों की गूंज जंगल का असली कानून होनी चाहिए, वहां आज एक अफसरशाह की हनक और उसकी कार के टायरों के निशान जंगल के नियमों को रौंद रहे हैं। सीधी जिले के जिलाधिकारी स्वारोचिष सोमवंशी पर आरोप है कि उन्होंने इस संरक्षित जंगल को “अपनी निजी जागीर बना लिया है” और बाघों के अभयारण्य को अपनी ऐशगाह में तब्दील कर दिया है।

बात बस इतनी नहीं है कि जिलाधिकारी जंगल घूमने चले गए—बात यह है कि वे खुद को जंगल का राजा समझ बैठे हैं!


‘जब अफसर की गाड़ी निकलती है, तो जंगल का कानून दब जाता है’

वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे का आरोप है कि साहब का मूड बनता है, तो गाड़ी जंगल में घुस जाती है। न कोई परमिशन, न कोई गाइड—बस एक निजी सफारी, जहां साहब और उनके खासमखास जंगल में “विहार” के लिए निकल पड़ते हैं।

अब नियम कायदों की बात करें तो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 और NTCA (राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण) के दिशानिर्देश कहते हैं कि टाइगर रिजर्व के मुख्य क्षेत्र (कोर एरिया) में अनधिकृत प्रवेश सख्त वर्जित है। लेकिन जब मामला एक ‘विशेष’ अधिकारी का हो, तो नियम बस कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए ही होते हैं!


दिन में सफारी बंद, लेकिन रात में साहब की ‘मौज’ चालू!

पर्यटकों के लिए जंगल में जाने के सख्त नियम हैं—कौन जाएगा, कब जाएगा, कितनी देर रुकेगा—सब तय है। लेकिन जब जिलाधिकारी साहब की गाड़ी चलती है, तो ये नियम भी किनारे हो जाते हैं। आरोप ये है कि:

  1. हर हफ्ते निजी जिप्सी में साहब टाइगर रिजर्व की ‘सैर’ पर निकलते हैं।
  2. जब आम लोगों की सफारी बंद होती है, तब साहब की सफारी चालू होती है।
  3. बाघों के इतने करीब तक चले जाते हैं कि उनकी नींद तक खराब हो जाती है!
  4. कभी-कभी गाड़ी रातभर जंगल में खड़ी रहती है।

अब सवाल उठता है कि आखिर जंगल का असली राजा कौन—बाघ या ब्यूरोक्रेसी?


‘सरकारी बाघ प्रेम’ या जंगल पर कब्जा?

बाघों के संरक्षण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। मगर जब जिलाधिकारी अपने दोस्तों के साथ जंगल में मटरगश्ती करने निकल पड़ें, तो ये संरक्षण है या शोषण? बाघ तो जंगल में हैं, पर असली शिकारी कौन है?


जांच जारी, लेकिन क्या कोई नतीजा निकलेगा?

संजय टाइगर रिजर्व के क्षेत्र निदेशक अमित कुमार ने कहा है कि वन विभाग ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है। जांच अधिकारी नरेंद्र रवि को जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जांच रिपोर्ट सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी?

अगर यही काम कोई आम नागरिक करता, तो अब तक उस पर कानूनी धाराएं लग चुकी होतीं, जुर्माना ठोक दिया जाता, और शायद जेल भी हो जाती। लेकिन जब मामला एक जिलाधिकारी का हो, तो… शायद बाघ भी खामोश हो जाते हैं।


अब फैसला आपको करना है…

अब देखना यह है कि क्या ये मामला भी जंगल की सूखी पत्तियों की तरह उड़ जाएगा, या फिर इस पर सख्त कार्रवाई होगी? सवाल बड़ा है, जवाब जनता को चाहिए!

(क्या आपको लगता है कि इस मामले में जिलाधिकारी पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट में बताएं!)

 

Author

  • Anshul Tiwari is a senior digital media and editorial professional with over 14 years of experience in digital journalism, editorial leadership, and Hindi news operations. He has worked with leading digital media organizations including Glance (InMobi Group) and The Quint.

    Over the course of his career, Anshul has led editorial teams, built digital content strategies, managed newsroom operations, and covered politics, current affairs, and breaking news. His expertise spans Hindi content strategy, multimedia storytelling, video and YouTube content planning, audience engagement, and digital distribution.

    With a strong understanding of how news, technology, and digital platforms intersect, Anshul brings a newsroom-first perspective to the evolving media landscape. He holds a Post Graduate Diploma in Journalism & Mass Communication from MDU, Rohtak.

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